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My Story - कथा एक किताब चोर की....



             
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कथा एक किताब चोर की....
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            यह मेरी कहानी है।मेरा नाम सतीश छिम्पा है।मैं राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के सूरतगढ़ कस्बे में रहता हूँ।एक साधारण परिवार में जन्मा मैं कुछ अजीब आदतों के साथ बड़ा हुआ था।किशोरावस्था के शुरू में ही मुझे किताबों के अध्ययन का चस्का पड़ गया था।किताबें मुझे आकर्षित करती,उनका तिलिस्म मुझे बांधता,मैं किसी बौड़म की तरह किताबों की खुशबुओं में खोया हुआ खोया ही रहना चाहता था।मगर पचास साठ रुपये कीमत वाली किताब खरीदना भी खांडे की धार हो जाती,मांग कर किताबें पढ़ता था।लोगों का निजी पुस्तकालय देखकर मेरा जी बळता, तड़प उठती और बैठ जाती।मगर होना क्या था।


          -"सर ज्ञानरंजन जी की यह किताब इश्यू करवानी है।"मैंने स्कूल के लाइब्रेरियन जिसके पास सिर्फ प्रभार था से कहा।


 -"किताब इश्यू नहीं कर सकते जब तक पुस्तकालयाध्यक्ष की नियुक्ति न हो जाए।"


   लेकिन मुझे वो किताब खींच रही थी अपनी ओर, वो देख रही थी मुझे हसरतों से और मैं उसकी तरह ललचाई निगाहों से,मेरी अंगुलियां उसके पन्नो पर फिसलने के लिए मचल रही थी और अध्यापक जी के पीठ फोरते ही किताब मैंने अंट में दाब ली और बाहर चला आया।मेरे दिल की धड़कनें रेल के इंजन की तरह चल रही थी,धूजता हुआ मैं क्लास में पहूंचा और बैग में किताब रखकर निश्चिन्त होने का प्रयास करने लगा,मगर सफल न हो सका और आधी छुट्टी को बैग उठाकर घर भाग गया।यह मेरी पहली चोरी थी और ज्ञान जी की कहानियां बहिर्गमन,पिता,फेन्स के इधर और उधर,घण्टा आदि मेरी प्रिय कहानियां बन गयी।उसके बाद वहां से चेखव,गोगोल,कृष्ण कल्पित,राजेंद्र यादव,मोहन राकेश की किताबें भी धीरे धीरे निकलता रहा और पढ़ता रहा।मेरे भूखे मन को जब्बर ख़ुराक मिलने लगी थी।फिर एक दिन पुस्तकालय पर ताला लटक गया।



         कॉलेज में चोरी करने की लोड़ ही नहीं थी।वहां किताबें मिल जाया करती थी।मुझे याद है जब मैंने विष्णु प्रभाकर की शरत पर लिखी "आवारा मसीहा" इश्यू करवाई तो लाइब्रेरियन ने कहा था कि 1978 के बाद यह किताब तुम ही पहली बार इश्यू करवा रहे हो।मुझे बहुत अच्छा लग रहा था और एक ही दिन में उसे पूरा पढ़ गया।एमिल जोला और तुर्गनेव को मैं अपने पास रखना चाहता था इसलिए अमृता प्रीतम की रसीदी टिकिट किताब हाथ में लेकर जोला और तुर्गनेव को अंट में दबा लिया और रसीदी टिकिट इश्यू करवा कर घर आ गया।यह वो दौर था जब मैं हर दिन एक किताब पढ़कर ही सोता था।आठ घण्टे की मेरी नींद तीन घण्टों में सिमट गयी थी।ये वो दिन थे जब जेब खाली और दिल भरा हुआ होता था।जेब तो आज भी खाली ही है मगर गर्दिश के उन दिनों में अरमान आसमानों को छूने के होते हुए भी पांव यथार्थ की जमीन पर टिके हुए थे।समोसा कचोरी की जगह किताब हथियाना अच्छा लगता था।
          मेरे एक परिचित के पास जबर्दस्त पुस्तकालय था।गोर्की,हेमिंग्वे,मोपांसा,चेखव,प्रेमचन्द,धूमिल आदि बहुत से कालजयी लेखक उसके पास थे मगर वो किताब देता नहीं था।
-"किताब दे दे यार प्लीज"
-"खरीद कर पढ़ने की आदत डाल,मैं नहीं देता।"
-"तेरे पिता तो सरकारी नौकरी में है,मैं कहाँ से खरीदूं,दे दे भाई।"
-"नहीं।"
-"देख दे दे,नींस तो चुरा लूंगा।"मैने कहा तो वो हंसने लगा और बात आई गयी हो गयी।और एक दिन जब वो घर नहीं था,आंटी जी से अनुमति लेकर मैं उसके कमरे में घुस गया और मोपांसा,गोर्की,चेखव मेरी अंट में थे और धूमिल,प्रेमचन्द और पास्तरनाक मेरे हाथ में थे।आज भी वो मुझसे किताब मांगता है।
        फिर मैं किताबें खरीदने लग गया और खरीद कर पढ़ने लग गया।अब जब भी उसे किताब की जरूरत होती है मैं दे देता हूँ मगर अब वो किताबें नहीं पढ़ता।इससे एक चीज मुझमे पैदा हो गयी कि जब भी कोई युवा या युवतर लड़का लड़की मुझसे किताब मांगते हैं,मैं मना नहीं कर पाता।


सतीश छिम्पा

(धन्यवाद बाबूलाल जी मेरे फेसबुक मित्र )


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